अर्थ की नई साइकिल
अर्थ की नई साइकिल
एक समय की बात है, एक छोटे से शहर में अर्थ नाम का एक लड़का अपने पापा के साथ रहता था। अर्थ को बाहर घूमना और नई चीज़ें सीखना बहुत पसंद था।
अर्थ का जन्मदिन आने वाला था। उसके पापा प्रीतम सिंह ने उसे एक सरप्राइज देने का वादा किया था।
जन्मदिन की सुबह, जब अर्थ पार्क में पहुँचा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ एक चमकती हुई लाल साइकिल खड़ी थी!
अर्थ बहुत खुश हुआ, लेकिन उसे साइकिल चलाना नहीं आता था। वह थोड़ा डरा हुआ था। पापा प्रीतम सिंह ने अर्थ के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा:
"बेटा, गिरोगे नहीं तो सीखोगे कैसे? मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
प्रीतम सिंह ने अपना पीला मफलर ठीक किया और अर्थ को साइकिल पर बिठाया। अर्थ ने पैडल मारना शुरू किया। शुरू में वह डगमगाया, पर पापा ने पीछे से साइकिल पकड़ी हुई थी।
धीरे-धीरे, अर्थ का आत्मविश्वास बढ़ने लगा। ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी। अचानक उसे अहसास हुआ कि पापा ने हाथ छोड़ दिया है और वह खुद साइकिल चला रहा है!
पार्क के लाल पेड़ों और नीले आसमान के नीचे, अर्थ और उसके पापा ने वह पूरा दिन साथ बिताया। अर्थ ने न सिर्फ साइकिल चलाना सीखा, बल्कि यह भी सीखा कि हिम्मत और भरोसे से कोई भी काम आसान हो जाता है।
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